राजसमंद में भाजपा-कांग्रेस के खिलाफ कुमावत समाज ने खोला मोर्चा, जिला परिषद की 8 और पंचायत समिति की 17 सीटों पर उतारे निर्दलीय प्रत्याशी

राजसमंद में भाजपा-कांग्रेस के खिलाफ कुमावत समाज ने खोला मोर्चा, जिला परिषद की 8 और पंचायत समिति की 17 सीटों पर उतारे निर्दलीय प्रत्याशी

84 गांवों की महापंचायत में दोनों पार्टियों के बहिष्कार का हुआ था ऐलान, निकाय चुनाव से शुरू हुई नाराजगी अब पंचायत चुनाव तक पहुंची, 2028 के विधानसभा चुनाव में भी ताकत दिखाने की चेतावनी
डीएस सेवन न्यूज राजसमंद। राजस्थान के राजसमंद जिले में पंचायतीराज चुनाव के बीच सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। निकाय चुनाव में अपेक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से नाराज कुमावत समाज अब भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर गया है। समाज ने जिला परिषद के 8 वार्डों और पंचायत समितियों के 17 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी उतारकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

जिले के कई गांवों में भाजपा और कांग्रेस के बहिष्कार से जुड़े पोस्टर और बैनर भी लगाए गए हैं। कुमावत समाज की इस लामबंदी के चलते पंचायत चुनाव में कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।

निकाय चुनाव से शुरू हुआ विवाद, सभापति पद नहीं मिलने से बढ़ी नाराजगी

दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत हाल ही में हुए नगर निकाय चुनाव से हुई थी। कुमावत समाज के अनुसार, नगर परिषद चुनाव में भाजपा के टिकट पर समाज के 9 प्रत्याशी पार्षद निर्वाचित हुए थे। इसके बाद समाज को उम्मीद थी कि नगर परिषद में सभापति पद पर उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।

समाज के लोगों का आरोप है कि चुनाव में समर्थन देने के बावजूद उनकी अपेक्षाओं को नजरअंदाज किया गया। इसको लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुआ, लेकिन प्रदर्शन के बाद 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से नाराजगी और बढ़ गई।

5 अक्टूबर को 84 गांवों की महापंचायत में लिया बड़ा फैसला

राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच 5 अक्टूबर को कुमावत समाज की 84 गांवों की महापंचायत आयोजित हुई। इसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों के बहिष्कार का ऐलान किया गया।

महापंचायत के इस फैसले का असर अब पंचायतीराज चुनाव में दिखाई देने लगा है। समाज ने केवल विरोध तक सीमित रहने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति अपनाई है।

किसान, ओबीसी, एससी और एसटी समाज को साथ लेकर तीसरे मोर्चे की तैयारी

कुमावत समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस की कथनी और करनी में अंतर है। इसी कारण इस बार दोनों पार्टियों के विकल्प के रूप में तीसरा मोर्चा खड़ा करने का प्रयास किया गया है।

समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार, इस राजनीतिक पहल में किसान वर्ग के साथ ओबीसी, एससी और एसटी सहित अन्य समाजों को भी साथ लेकर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई गई है।

2028 के विधानसभा चुनाव में भी ताकत दिखाने की चेतावनी

कुमावत समाज की नाराजगी केवल पंचायत चुनाव तक सीमित नहीं रहने वाली है। समाज के प्रतिनिधियों ने वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की चेतावनी दी है।

समाज के नेताओं का दावा है कि कुंभलगढ़ सहित जिले की विधानसभा सीटों पर कुमावत मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में यदि समाज की नाराजगी बरकरार रहती है तो आगामी विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

निर्दलीय प्रत्याशियों से किसे होगा नुकसान? चुनावी नतीजों पर टिकी निगाहें

जिला परिषद की 8 और तीनों पंचायत समितियों के 17 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। कुमावत समाज के प्रभाव वाले गांवों में लगे बहिष्कार के बैनर भी इस राजनीतिक विरोध को सामने ला रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुमावत समाज की यह चुनावी रणनीति भाजपा और कांग्रेस में से किस पार्टी को अधिक नुकसान पहुंचाएगी। निर्दलीय प्रत्याशी कितनी सीटों पर जीत दर्ज कर पाएंगे और कितने वार्डों में प्रमुख दलों के वोटों का गणित बिगाड़ेंगे, इसका फैसला चुनाव परिणाम आने के बाद ही होगा।

फिलहाल राजसमंद में कुमावत समाज की इस राजनीतिक सक्रियता ने पंचायत चुनाव को नया मोड़ दे दिया है। दोनों प्रमुख दलों के सामने अपने परंपरागत समर्थन को बनाए रखने की चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।

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