डीएस सेवन न्यूज चित्तौड़गढ़ जिले के गंगरार क्षेत्र में स्थित मेवाड़ विश्वविद्यालय इन दिनों बीएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम को लेकर उठे सवालों के कारण फिर चर्चा के केंद्र में है। मान्यता, प्रवेश प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े मुद्दों ने विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। यह विवाद केवल परिसर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अभिभावकों, शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन का ध्यान भी आकर्षित कर चुका है।
विवाद की जड़ में विद्यार्थियों की वह चिंता है, जिसमें उनका कहना है कि प्रवेश के समय पाठ्यक्रम को वैधानिक रूप से स्वीकृत बताया गया था। चार वर्ष पूर्व काउंसलिंग और प्रचार के दौरान मिली जानकारी पर भरोसा कर विद्यार्थियों ने अपने करियर की दिशा तय की, किंतु समय के साथ मान्यता की वास्तविक स्थिति पर संदेह उभरने लगे। विद्यार्थियों के अनुसार यदि प्रारंभ में पारदर्शिता बरती जाती, तो वे वैकल्पिक निर्णय ले सकते थे। इसी असमंजस ने धीरे-धीरे असंतोष का रूप लिया।
स्थिति तब अधिक संवेदनशील बन गई जब मान्यता संबंधी प्रश्न उठाने वाले लगभग 33 विद्यार्थियों के निलंबन की बात सामने आई। इस कदम के बाद परिसर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। विरोध-प्रदर्शनों और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के बीच छात्रों ने मानसिक दबाव और असुरक्षा की भावना व्यक्त की। मेस में तोड़फोड़ और कुछ छात्रों के हाथों में लाठियां, स्टिक व क्रिकेट बैट देखे जाने के दावों ने भी अन्य छात्र-छात्राओं के बीच चिंता बढ़ाई। कई विद्यार्थियों का कहना है कि पढ़ाई का वातावरण प्रभावित हुआ और अनिश्चितता का भाव गहरा गया।
घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक सक्रियता तेज हुई। स्थानीय अधिकारियों और पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही। इसी क्रम में गंगरार पुलिस थाने में विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े पदाधिकारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई। शिकायत में प्रवेश, मान्यता और दस्तावेजों से जुड़े आरोपों का उल्लेख बताया गया है, जिनकी जांच को लेकर सभी पक्षों की निगाहें टिकी हैं।
छात्रावास खाली करवाने के निर्देशों ने विवाद को और मानवीय आयाम दे दिया। कई विद्यार्थियों ने दावा किया कि उन्हें अचानक हॉस्टल खाली करने के आदेश मिले, जिससे आवास और यात्रा की समस्या उत्पन्न हुई। आरक्षण न मिलने और परिवहन साधनों में सीटों की कमी के कारण कुछ छात्र चित्तौड़गढ़ में अस्थायी रूप से ठहरने को मजबूर हुए। इस स्थिति ने आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का दबाव बढ़ाया। अभिभावकों ने भी इस पहलू पर चिंता जताते हुए संतुलित समाधान की अपेक्षा की।।
नर्सिंग पाठ्यक्रमों की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर विशेषज्ञों का मत स्पष्ट है कि ऐसे पाठ्यक्रमों के संचालन हेतु राज्य सरकार से एनओसी और संबंधित नियामक संस्थाओं की मान्यता अनिवार्य होती है। प्रमुख संस्थाओं में राजस्थान नर्सिंग काउंसिल तथा इंडियन नर्सिंग काउंसिल का नाम लिया जाता है। विद्यार्थियों का आरोप है कि मान्यता की स्थिति स्पष्ट न होने के बावजूद प्रवेश दिए गए, जिससे डिग्री और पंजीकरण को लेकर भ्रम की स्थिति बनी।
मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष भी सामने आया है। वाइस चांसलर डॉ. आलोक मिश्रा ने कहा कि विद्यार्थियों को प्रवेश न्यायालय के आदेश के आधार पर दिए गए और राज्य सरकार की ओर से मान्यता को लेकर बाधाएं उत्पन्न हुईं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार के स्तर पर सहयोग की कमी रही। वहीं उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार न्यायालय द्वारा सरकार को मान्यता देने के लिए बाध्य नहीं किए जाने की बात भी चर्चा में रही, जिससे विवाद की व्याख्या अलग-अलग रूप में हो रही है।।
राजनीतिक संदर्भों ने भी इस प्रकरण को सुर्खियों में बनाए रखा। प्रदेश की भजनलाल शर्मा सरकार का नाम प्रशासनिक निर्णयों के संदर्भ में लिया जा रहा है, जबकि पूर्व में जांच संबंधी चर्चाओं में किरोड़ी लाल मीणा का नाम भी जुड़ा रहा है। अतीत में फर्जी डिग्री से जुड़े आरोपों की जांच को लेकर हुए घटनाक्रमों ने वर्तमान विवाद को और संवेदनशील बना दिया है। हालांकि, उन मामलों में सार्वजनिक निष्कर्ष सीमित रहे, जिससे प्रश्न पूरी तरह शांत नहीं हो पाए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी उभरकर आया है कि मीडिया में विषय उठने के बाद प्रशासनिक हलचल तेज हुई। विद्यार्थियों और स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि कल प्रकाशित खबरों के बाद आज स्थिति में कुछ बदलाव और सक्रियता देखने को मिली। ऐसे परिदृश्य में निष्पक्ष और तथ्याधारित रिपोर्टिंग की भूमिका पर भी ध्यान गया है, जहाँ मुद्दों को सामने लाने से संवाद और जवाबदेही को बल मिलता है।
फिलहाल, समाधान की दिशा जांच और आधिकारिक निर्णयों पर निर्भर है। विद्यार्थी अपने शैक्षणिक भविष्य की सुरक्षा, स्पष्ट मान्यता स्थिति और स्थिर अकादमिक वातावरण की अपेक्षा कर रहे हैं। यह प्रकरण उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता, नियामक अनुपालन और संस्थागत जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर उठने वाले कदम न केवल संबंधित विद्यार्थियों, बल्कि व्यापक शिक्षा व्यवस्था के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
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