चित्तौड़गढ़ रावतभाटा में प्रशासन की सख्ती पर उठे सवाल: अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई के बीच मासूम बच्चा पिता को बचाने के लिए खाकी से लगाता रहा गुहार, क्या कानून के आगे इंसानियत बेबस?

रावतभाटा में ‘कार्रवाई’ या ‘बेरुखी’? अतिक्रमण हटाओ अभियान के बीच मासूम की चीखों ने खड़े किए बड़े सवाल

डीएस सेवन न्यूज चित्तौड़गढ़ रावतभाटा कानून अपना काम करता है और व्यवस्थाएं अपने नियमों से चलती हैं, लेकिन क्या इन सख्त दायरों के बीच इंसानियत के लिए भी कोई जगह बची है? राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा क्षेत्र से सामने आई एक घटना ने इसी सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है। विकास और व्यवस्था के नाम पर प्रशासन की कार्रवाई तो हुई, लेकिन उसकी गूंज एक मासूम बच्चे की सिसकियों में कहीं दबकर रह गई, जिसने हर किसी का दिल झकझोर दिया।

यह दृश्य बेहद विचलित करने वाला था—एक तरफ खाकी वर्दी का रुतबा और कानून का सख्त चेहरा, तो दूसरी तरफ बिलखता हुआ बचपन, जो सिर्फ इतना समझ पा रहा था कि उसके पिता को उससे दूर ले जाया जा रहा है। अंबेडकर जयंती जैसे दिन, जब पूरे देश में अधिकारों और न्याय की बातें हो रही थीं, उसी दिन एक मासूम अपने पिता के लिए रहम की गुहार लगाता नजर आया।
मामला चारभुजा क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां नगर पालिका की टीम अतिक्रमण हटाने के अभियान पर निकली थी। इसी दौरान एक सब्जी विक्रेता ने अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए विरोध जताया। बहस बढ़ी और स्थिति ऐसी बनी कि उसे हिरासत में लेने की नौबत आ गई। लेकिन इस पूरी कानूनी कार्रवाई के बीच जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने सोशल मीडिया पर आक्रोश और संवेदना दोनों की लहर दौड़ा दी।

प्रशासन की ओर से इस कार्रवाई को पूरी तरह नियमों के तहत और आवश्यक बताया गया है। अतिक्रमण विरोधी दस्ते के प्रभारी नरपत सिंह का कहना है कि यह कदम व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी था। लेकिन सवाल वहीं खड़ा है—क्या कानून का पालन करते हुए संवेदनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है?

रावतभाटा की यह घटना सिर्फ एक कार्रवाई नहीं, बल्कि सिस्टम और समाज के बीच संवेदनशीलता की परीक्षा बनकर सामने आई है। विकास की राह में क्या इंसानियत को पीछे छोड़ देना सही है, या फिर सख्ती के साथ सहानुभूति का संतुलन भी जरूरी है? यह सवाल अब हर किसी के मन में है।

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