सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने से डर गया शिक्षा विभाग? कैमरे पर रोक के फरमान ने खड़े किए बड़े सवाल
एक और सवाल: क्या वाकई सरकारी स्कूल और शिक्षा विभाग अपनी जगह सही हैं, तो फिर कैमरे और मीडिया की कवरेज से इतनी परेशानी क्यों?
यह तस्वीर सिर्फ खाली सिर्फ दर्शाने के लिए ली गई है कवर पेज की
जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री और बिना अनुमति फोटो-वीडियो बनाने पर शिक्षा विभाग के नए निर्देशों के बाद अब सरकार की मंशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विभाग ने स्कूल परिसरों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को नियंत्रित करने के साथ ही प्रधानाचार्य की पूर्व लिखित अनुमति के बिना फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग पर रोक लगा दी है।
विभाग ने अपने आदेश के पीछे विद्यार्थियों की सुरक्षा और निजता का हवाला दिया है। आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले निजता के अधिकार, सुप्रीम कोर्ट के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसले और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्कूल सुरक्षा संबंधी गाइडलाइन का उल्लेख किया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि <u>क्या बच्चों की निजता की आड़ में सरकारी स्कूलों की बदहाली की तस्वीरें सामने आने से रोकने की कोशिश तो नहीं की जा रही?</u>
शिक्षा विभाग का यह आदेश ऐसे समय आया है, जब कुछ दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं/प्रवक्ताओं के एक सरकारी स्कूल पहुंचने का मामला सामने आया था। वहां स्कूल की जर्जर स्थिति और विद्यार्थियों के लिए पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए गए थे। स्कूल की स्थिति से जुड़े वीडियो और लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए व्यवस्थाओं को सार्वजनिक किया गया।
हालांकि, इस दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि वहां विद्यार्थियों का आंदोलन पहले से चल रहा था और संबंधित लोग आंदोलन समाप्त होने के बाद स्कूल पहुंचे थे। इसलिए पूरे घटनाक्रम को केवल किसी एक संगठन के आंदोलन से जोड़ना उचित नहीं होगा।
मीडिया कैमरा लेकर पहुंचेगा तो पहले अनुमति लेनी होगी
नए निर्देशों के बाद <u>मीडिया के लिए भी स्कूल परिसर में प्रवेश और कवरेज आसान नहीं रहेगा।</u> किसी स्कूल की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करनी है, फोटो लेनी है, वीडियो बनाना है, किसी शिक्षक या विद्यार्थी का इंटरव्यू करना है अथवा लाइव करना है तो प्रधानाचार्य की पूर्व लिखित अनुमति जरूरी होगी।
यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—<u>अगर किसी सरकारी स्कूल में वास्तव में छत जर्जर है, बच्चों के लिए पानी नहीं है, शौचालय खराब हैं, शिक्षक नहीं हैं या भवन की हालत खतरनाक है, तो मीडिया उन समस्याओं को कैमरे में कैद करके जनता तक कैसे पहुंचाएगा?</u>
क्योंकि पिछले दिनों राजस्थान के अलग-अलग सरकारी स्कूलों से ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जिनमें स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं पर सवाल उठे हैं। कई जगह विद्यार्थियों ने पंखे, पानी, शौचालय और शिक्षकों की कमी को लेकर प्रदर्शन तक किए हैं।
स्कूलों की बदहाली दिखाने वाली तस्वीरों पर अब ‘पहले अनुमति’
सरकारी स्कूलों की कमियों को लेकर लगातार वीडियो सामने आने के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि <u>क्या शिक्षा विभाग को उन तस्वीरों से परेशानी होने लगी है, जो स्कूलों की जमीनी हकीकत जनता के सामने रखती हैं?</u>
सरकार का तर्क है कि बिना अनुमति स्कूलों में कोई भी व्यक्ति प्रवेश कर विद्यार्थियों या महिला शिक्षकों के फोटो-वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर देता है। कई शिक्षक और अभिभावक ऐसी शिकायतें कर चुके हैं। विशेषकर छात्राओं और शिक्षिकाओं की निजता से जुड़ा मामला गंभीर है।
यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरी तरफ सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
सरकार से सवाल—अगर सब ठीक है तो कैमरे से डर कैसा?
विपक्ष ने इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस नेता गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि सरकार स्कूलों की बदहाली सुधारने के बजाय उसकी तस्वीरें सामने आने से रोकने का रास्ता तलाश रही है। उनका सवाल है कि यदि सरकारी स्कूलों में व्यवस्थाएं बेहतर हैं तो फोटो और वीडियो सामने आने से परेशानी क्यों होनी चाहिए?
हालांकि, स्कूलों की वर्तमान स्थिति के लिए केवल मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहराना भी पूरे मुद्दे की तस्वीर नहीं बताता। राजस्थान में लंबे समय से सरकारी स्कूलों में भवनों की स्थिति, शिक्षकों की कमी और मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
मीडिया को रोकना समाधान या सवालों से बचने का रास्ता?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल मीडिया की भूमिका को लेकर है। सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं और वहां पढ़ने वाले बच्चे आम परिवारों से आते हैं। ऐसे में यदि किसी स्कूल में गंभीर लापरवाही सामने आती है तो उसकी रिपोर्टिंग करना मीडिया की जिम्मेदारी है।
अगर कैमरा स्कूल के अंदर तभी जा सकता है जब स्कूल प्रशासन खुद अनुमति दे, तो फिर उस स्कूल की कमियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष तस्वीर जनता तक कैसे पहुंचेगी?
विद्यार्थियों की निजता और सुरक्षा की रक्षा जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर ऐसी व्यवस्था भी नहीं बननी चाहिए जिससे सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र रिपोर्टिंग ही मुश्किल हो जाए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा विभाग के ये निर्देश विद्यार्थियों की सुरक्षा तक सीमित रहते हैं या सरकारी स्कूलों की बदहाली सामने लाने वाली मीडिया कवरेज पर भी इसका व्यापक असर पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल फिलहाल यही है—<u>सरकार स्कूलों की हालत सुधारने से ज्यादा उसकी तस्वीरें सामने आने से चिंतित है, या यह आदेश वास्तव में बच्चों की निजता और सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है?</u>
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