चित्तौड़गढ़ बच्चे की मदद करने पहुंचे होमगार्ड से थाने में बहस, वीडियो रोकने पर उठे सवाल—अब मासूम की तलाश में चाइल्ड लाइन

बच्चे की मदद करने पहुंचे तो वीडियो बंद कराने पर जोर! बस्सी थाने में ASI के व्यवहार पर सवाल, अब चाइल्ड लाइन को भी नहीं मिला 10 साल का मासूम

डीएस सेवन न्यूज चित्तौड़गढ़/बस्सी। बस्सी थाना क्षेत्र में एक 10 वर्षीय बच्चे से जुड़े मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। रविवार को रास्ते में अकेले और रोते मिले बच्चे को एक होमगार्ड मदद के लिए बस्सी थाने लेकर पहुंचा था। इसी दौरान थाने में मौजूद एएसआई हंसराज द्वारा वीडियो बनाए जाने पर आपत्ति जताने और उसे बंद कराने को लेकर बहस होने का वीडियो सामने आया है। घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि थाने तक पहुंचे अकेले बच्चे को सुरक्षित तरीके से उसके परिजनों अथवा बाल संरक्षण व्यवस्था तक पहुंचाने की प्रक्रिया क्या अपनाई गई?

मददगारों का आरोप—वीडियो बंद कराने पर दिया जोर

जानकारी के अनुसार, होमगार्ड मुकेश शर्मा को रास्ते में करीब 10 साल का बच्चा अकेला और रोता हुआ मिला। बच्चे की मदद के उद्देश्य से वह उसे बस्सी थाने लेकर पहुंचे। साथ आए ग्रामीणों ने घटना की रिकॉर्डिंग शुरू की। वीडियो में एएसआई हंसराज द्वारा वीडियो बंद करने को लेकर नाराजगी जताते हुए दिखाई देने की बात सामने आई है।

मौके पर मौजूद लोगों का कहना था कि वीडियो किसी गलत उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और बच्चे को उसके परिजनों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को रिकॉर्ड करने के लिए बनाया जा रहा था। इसके बावजूद वीडियो बंद कराने को लेकर विवाद की स्थिति बनी।

वर्दी को लेकर भी उठे सवाल

घटना के वायरल वीडियो में एएसआई के सिर पर टोपी और वर्दी पर बेल्ट नहीं दिखाई देने को लेकर भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाए गए। हालांकि, वीडियो रिकॉर्ड किए जाने का वास्तविक कारण क्या था और एएसआई ने वीडियो बंद कराने को लेकर आपत्ति क्यों जताई, इसे लेकर पुलिस पक्ष की अपनी बात है।

ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि थाने में किसी अकेले बच्चे को कोई नागरिक लेकर पहुंचता है, तो प्राथमिकता उसकी सुरक्षा, पहचान और परिजनों की तलाश होनी चाहिए या वीडियो बनाने को लेकर विवाद?

बच्चे को थाने से आगे भेजने की प्रक्रिया पर भी सवाल

थानाधिकारी प्रेम सिंह के अनुसार, रविवार को मुख्यमंत्री और गृह मंत्री के कार्यक्रम में ड्यूटी होने के कारण वे थाने पर मौजूद नहीं थे। उनके अनुसार, जानकारी में आया कि वीडियो बनाने को लेकर कुछ बहस हुई थी और एएसआई ने बताया कि मामला कोतवाली थाना क्षेत्र से संबंधित था, इसलिए बच्चे को वहां छोड़ने के लिए कहा गया।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह है कि बच्चे को सुरक्षित रूप से बाल संरक्षण व्यवस्था या संबंधित थाने तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किस स्तर पर सुनिश्चित की गई?

खबर सामने आने के बाद चाइल्ड लाइन की टीम पहुंची, लेकिन बच्चा नहीं मिला

मामले की जानकारी सामने आने और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सोमवार को चाइल्ड लाइन की टीम बस्सी पहुंची। टीम ने बच्चे की तलाश की, लेकिन बच्चा नहीं मिला।

सीडब्ल्यूसी होम बस्सी से जुड़े रामगोपाल ओझा ने बताया कि चाइल्ड लाइन से करण और टीम बच्चे को तलाशने पहुंची थी। उन्होंने भी बच्चे की तलाश की, लेकिन उसका पता नहीं चल सका। उनका कहना है कि सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में स्थानीय पुलिस बच्चे को बाल संरक्षण व्यवस्था से जुड़े लोगों को सौंप देती है, जिसके बाद बच्चे को चित्तौड़गढ़ भेजने की प्रक्रिया की जा सकती है। इस मामले में बच्चा उन्हें नहीं सौंपा गया और अब उसकी तलाश की जा रही है।

मामला सिर्फ वीडियो का नहीं, बच्चे की सुरक्षा का है

इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यशैली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अकेले मिले बच्चे को मदद के लिए थाने लाने वाले व्यक्ति के साथ यदि वीडियो को लेकर विवाद होता है और बाद में संबंधित बाल संरक्षण टीम को भी बच्चा नहीं मिलता, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि बच्चे की सुरक्षित काउंसलिंग, पहचान और परिजनों तक पहुंचाने की प्रक्रिया किस तरह पूरी की गई?

ऐसे मामलों में आम नागरिक अक्सर पुलिस और प्रशासन से मदद की उम्मीद करता है। यदि मदद के लिए आगे आने वाले लोगों को थाने में असहज स्थिति का सामना करना पड़े, तो भविष्य में कोई व्यक्ति किसी लावारिस या परेशान बच्चे की मदद के लिए थाने तक पहुंचने से पहले कई बार सोच सकता है।

अब जरूरत इस बात की है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्षता से पड़ताल हो, बच्चे को जल्द सुरक्षित तलाश कर उसके परिजनों तक पहुंचाया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि थाने में बच्चे के पहुंचने से लेकर उसके वहां से जाने तक निर्धारित बाल संरक्षण प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं।

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