जर्जर स्कूल की बदहाली छिपाने का जरिया बना आदेश? मीडिया की एंट्री पर शर्तें, शिक्षा विभाग की नाकामी पर उठे सवाल
डीएस सेवन न्यूज जयपुर। रामपुरा गांव की प्राथमिक स्कूल की जर्जर हालत और बच्चों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर शिक्षा विभाग पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। करीब एक साल पहले जर्जर घोषित कर स्कूल भवन को बंद कर दिया गया था। विभाग की ओर से नोटिस चस्पा कर भवन को पूर्णतः जर्जर बताते हुए प्रवेश प्रतिबंधित किया गया। इसके बाद बच्चों को दूसरी जगह शिफ्ट किया गया, लेकिन रेलवे क्रॉसिंग के चलते बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए उन्हें वापस गांव में ही दूसरी जगह पढ़ाया जाने लगा।
हैरानी की बात यह है कि अब बच्चों की कक्षाएं गांव में एक ग्रामीण के घर के पास बने भैंसों के तबेले और चारे के बीच संचालित होने की तस्वीरें सामने आ रही हैं। जहां बच्चों का भविष्य संवरना चाहिए, वहां आसपास पशु बांधे जा रहे हैं और चारा रखा हुआ है।
इसी स्कूल की बदहाली को सामने लाने के लिए सीजेपी के कार्यकर्ता आशुतोष शाखा के नेतृत्व में मौके पर पहुंचने वाले थे, लेकिन उन्हें गांव वालों ने दौड़ा-दौड़ाकर भगा दिया। इसके बाद शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने गांव वालों को विद्यालय की सुरक्षा करने के लिए बधाई दी।
मीडिया की एंट्री पर शिक्षा विभाग का आदेश, क्या नाकामी छिपाने की कोशिश?
वहीं शिक्षा विभाग की ओर से आदेश जारी कर कहा गया है कि स्कूलों में मीडिया द्वारा वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी अनिवार्य नहीं है। यदि किसी स्कूल की वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी करनी है तो संस्था प्रधान से लिखित अनुमति लेना जरूरी बताया गया है।
अब सवाल यह है कि क्या इसी आदेश के जरिए स्कूलों को मीडिया की नजरों से दूर रखने की कोशिश की जा रही है?
अगर स्कूल की जर्जर हालत है, बच्चों की पढ़ाई भैंसों के तबेले के पास होने की तस्वीरें सामने आ रही हैं और शिक्षा विभाग की व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं, तो क्या इन तस्वीरों को सामने आने से रोकना समस्या का समाधान है?
मौके से सामने आई तस्वीरें शिक्षा विभाग के दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं। ऐसे में कहीं न कहीं यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विभाग अपनी नाकामी को छिपाने के लिए इस आदेश का सहारा लेता नजर आ रहा है?
नोटिस से जर्जर स्कूल की हकीकत नहीं छिप सकती
विभाग ने जर्जर भवन को बंद कर बच्चों की सुरक्षा का हवाला दिया, लेकिन असली सवाल वैकल्पिक व्यवस्था का है। जर्जर स्कूल से बच्चों को निकालना जरूरी था, लेकिन उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ और उचित शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना भी शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है।
आज तस्वीर यह है कि जिस स्कूल भवन को बच्चों के लिए खतरनाक बताकर बंद किया गया, उसके बाद बच्चों को जिस जगह पढ़ाया जा रहा है, वहां पशुओं का तबेला और चारा नजर आ रहा है।
स्कूल बंद करने का नोटिस तो लगा दिया गया, लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए सुरक्षित व्यवस्था का इंतजाम कब होगा?
शिक्षा मंत्री ने गांव वालों को दी बधाई
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने सीजेपी कार्यकर्ताओं के विद्यालय पहुंचने को अनुचित बताते हुए कहा कि बिना अनुमति के विद्यालय में जाना ठीक नहीं है। उन्होंने विद्यालय की सुरक्षा करने वाले गांव वालों को बधाई दी और कहा कि स्कूल सुरक्षित रहना चाहिए, मर्यादाएं बनी रहनी चाहिए और विद्यालय की निजता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
मंत्री ने कहा कि यदि किसी को उचित कारण से विद्यालय जाना है तो संस्था प्रधान से अनुमति लेनी चाहिए और संस्था प्रधान जो दिखाना उचित समझें, वही दिखाया जाए।
पत्थरबाजी करने वालों को बधाई या कार्रवाई? बड़ा सवाल
शिक्षा मंत्री के इस बयान के बाद अब सवाल यह भी है कि यदि मौके पर मारपीट और पत्थरबाजी के आरोप सामने आए हैं, तो विद्यालय की सुरक्षा के नाम पर पत्थरबाजी करने वालों को बधाई देना कितना उचित है?
क्या शिक्षा व्यवस्था की बदहाली दिखाने वालों को रोकना ज्यादा जरूरी है या उन हालात को सुधारना, जिनकी वजह से सवाल उठ रहे हैं?
एक तरफ जर्जर स्कूल, दूसरी तरफ तबेले के पास पढ़ते बच्चे और तीसरी तरफ मीडिया की वीडियोग्राफी पर अनुमति की शर्त—इन तीनों के बीच शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
अब सवाल सिर्फ रामपुरा के स्कूल का नहीं, बल्कि यह है कि क्या आदेशों की आड़ में शिक्षा विभाग अपनी नाकामी की तस्वीरें जनता और मीडिया से दूर रखना चाहता है?
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