2 महीने से गायब नाबालिग बेटी सिस्टम पर सवाल: जीवन सिंह शेरपुर बोले—‘गरीब की बेटी है इसलिए सुनवाई नहीं कलेक्टर और एसपी जिम्मेदार

2 महीने से लापता नाबालिग: परिवार की पुकार और सिस्टम पर सवाल, कलेक्टर कार्यालय घेराव से पहले छलका दर्द
डीएस सेवन न्यूज मध्य प्रदेश में एक नाबालिग बच्ची के लापता होने का मामला अब केवल एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह बनता जा रहा है। करीब दो महीने से 14 वर्षीय बच्ची के गायब होने के बावजूद अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आने से परिजन गहरे आक्रोश और निराशा में हैं। कलेक्टर कार्यालय के घेराव से पहले पीड़ित परिवार और उनके साथ खड़े लोगों ने अपनी पीड़ा खुलकर सामने रखी।

परिजनों के अनुसार, बच्ची रोज की तरह स्कूल के लिए निकली थी, लेकिन वापस घर नहीं लौटी। शुरुआत में परिवार ने अपने स्तर पर तलाश की, आस-पास के लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। समय बीतने के साथ चिंता बढ़ती गई और आखिरकार मामला पुलिस तक पहुंचा। शिकायत दर्ज होने के बाद भी परिवार को केवल आश्वासन ही मिलता रहा।

परिवार का आरोप है कि उन्होंने संभावित युवक के बारे में पुलिस को पूरी जानकारी दी, जिसमें उसका नाम, मोबाइल नंबर और पता तक शामिल है। इसके बावजूद, कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी रही। परिजनों का कहना है कि अगर शुरुआती दिनों में ही सख्ती दिखाई जाती, तो शायद बच्ची को जल्द ढूंढा जा सकता था।

इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गरीब परिवारों की समस्याएं प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं होतीं? पीड़ित परिवार की महिला सदस्य ने भावुक होकर कहा कि “हमारे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन हमारी बेटी हमारे लिए सब कुछ है। हमें बस यह जानना है कि वह सुरक्षित है या नहीं।” उनकी यह बात वहां मौजूद हर व्यक्ति को अंदर तक झकझोर गई।

घेराव से पहले लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे अपनी बात रखने के लिए अधिकारियों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्हें रास्ते में ही रोक दिया गया। इस घटना ने आक्रोश को और बढ़ा दिया। लोगों का कहना था कि जब कोई पीड़ित अपने हक के लिए आवाज उठा रहा है, तो उसे रोकना कहीं न कहीं उसकी पीड़ा को नजरअंदाज करना है।

इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन की कार्यशैली को लेकर कई तरह के सवाल उठे। लोगों का कहना है कि जनसुनवाई जैसी व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं। यदि वास्तव में इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य लोगों की समस्याओं का समाधान करना है, तो ऐसे गंभीर मामलों में तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

मामले को उठाने वाले लोगों ने यह भी कहा कि प्रशासन को जमीनी स्तर पर उतरकर काम करना चाहिए। उनका मानना है कि अधिकारी यदि खुद पहल करें और पीड़ित परिवार से संवाद स्थापित करें, तो न केवल विश्वास बढ़ेगा बल्कि समाधान भी तेजी से निकल सकता है।

परिवार की स्थिति को देखकर यह साफ महसूस होता है कि वे केवल अपनी बेटी की तलाश में नहीं हैं, बल्कि एक व्यवस्था से जवाब भी चाहते हैं। उनके लिए हर दिन एक नए संघर्ष की तरह है। सुबह उम्मीद के साथ शुरू होती है, लेकिन रात तक वही निराशा लौट आती है।

इस दौरान कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यदि मामला किसी प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा होता, तो शायद अब तक पूरी प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय हो जाती। इस तरह की बातें समाज में असमानता की भावना को और गहरा करती हैं।

मामले में यह भी सामने आया कि परिवार को बार-बार अलग-अलग जगहों पर जाने के लिए कहा गया, लेकिन कहीं भी उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इससे उनकी परेशानी और बढ़ गई। उनका कहना है कि वे अब थक चुके हैं, लेकिन अपनी बेटी को ढूंढने की उम्मीद नहीं छोड़ सकते।

इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि बच्ची नाबालिग है। ऐसे मामलों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि हर बीतता दिन जोखिम को बढ़ा सकता है। यही कारण है कि परिजन लगातार प्रशासन से तेजी दिखाने की मांग कर रहे हैं।

घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने मीडिया से भी अपील की कि इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाए, ताकि प्रशासन पर दबाव बने और बच्ची की जल्द से जल्द तलाश हो सके। उनका मानना है कि जब तक मामला सुर्खियों में नहीं आएगा, तब तक कार्रवाई की गति धीमी ही रहेगी।

इस बीच, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यह केवल एक परिवार का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों के साथ खड़ा हो। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह एक खतरनाक संदेश जाएगा।

मामले ने स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना लिया है। लोग आपस में इस घटना को लेकर चर्चा कर रहे हैं और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि इस तरह के मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है।

अंततः, यह मामला केवल एक लापता बच्ची का नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का भी है जो आम नागरिक प्रशासन पर करता है। यदि यही भरोसा कमजोर पड़ता है, तो इसका असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है।

अब सभी की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है और कब तक पीड़ित परिवार को राहत मिलती है। फिलहाल, परिवार की एक ही मांग है—उनकी बेटी सुरक्षित वापस मिल जाए।

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