सांवलियाजी मंदिर मंडल की संपत्ति सरकार का खजाना नहीं, न्यायालय का बड़ा फैसला

सांवलियाजी मंदिर मंडल की संपत्ति सरकार का खजाना नहीं, न्यायालय का बड़ा फैसला
अब चढ़ावा राशि का राजनीतिक उपयोग नहीं, भक्तों के हितों हेतु खर्च होगी निधि

डीएस सेवन न्यूज़ चित्तौड़गढ़ मेवाड़ के प्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलियाजी मंदिर के भंडार की धनराशि के उपयोग पर मंडफिया सिविल न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मंदिर निधि सरकारी खजाना नहीं बल्कि भगवान की संपत्ति है, जिसका प्रयोग किसी भी राजनीतिक उद्देश्य या बाहरी योजनाओं में नहीं किया जा सकता। अदालत ने आदेश जारी कर चढ़ावे की राशि को मंदिर बोर्ड के प्रावधानों के विपरीत बाहरी क्षेत्रों में खर्च करने पर स्थाई रोक लगा दी।

चढ़ावे की राशि के दुरुपयोग को लेकर दर्ज हुआ था वाद

अधिवक्ता उमेश आगार ने बताया कि मंदिर भंडार की राशि के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2018 में मंडफिया सिविल न्यायालय में वाद दायर किया गया था। वादी पक्ष में मदन जैन, कैलाशचन्द्र डाड, श्रवण तिवारी, शीतल डाड, प्रकाश सोनी, लक्ष्मीलाल गुर्जर सहित अन्य भक्त शामिल थे। उनका आरोप था कि मंदिर मंडल भक्तों द्वारा चढ़ाई गई करोड़ों की राशि का मनमाने तरीके से बाहरी योजनाओं में उपयोग कर रहा है।

वादीगणों के अनुसार इस निधि से 18 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री बजट घोषणा को पूरा करने हेतु मातृकुंडिया तीर्थस्थल विकास परियोजना के लिए स्वीकृत किए गए थे, जबकि यह मंदिर अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत था। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पहले अस्थाई निषेधाज्ञा जारी की, और अब अंतिम निर्णय में इस स्वीकृति को निरस्त कर स्थाई रोक लगा दी।
स्थानीय भक्तों की मांग: पहले सुविधा, फिर बाहरी खर्च

वादी पक्ष ने तर्क दिया कि सांवलियाजी मंदिर परिसर और आसपास के गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, जबकि धनराशि बाहर की परियोजनाओं में खर्च की जा रही है। उन्होंने अदालत में बताया कि—

दर्शनार्थियों के लिए निशुल्क भोजनशाला

पार्किंग, शौचालय, पेयजल व चिकित्सा सेवाएँ

उच्च स्तरीय अस्पताल, विद्यालय, लाइब्रेरी

पार्क और यात्री सुविधाएँ


जैसी जरूरतें वर्षों से लंबित हैं, पर राजनीतिक हितों के चलते राशि बाहर भेजी गई।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश: मंदिर की निधि का राजनीतिक उपयोग नहीं

न्यायालय ने अपने निर्णय में 5 मुख्य विवाद बिंदु दर्ज करते हुए कहा कि—

मंदिर मंडल की निधि सरकार की संपत्ति नहीं, देवता की निजी संपत्ति है।

निधि का उपयोग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं किया जा सकता।

निधि का दुरुपयोग व्यक्तिगत जिम्मेदारी का कृत्य माना जाएगा।

ऐसा करने पर अपराधिक न्याय भंग का अपराध बन सकता है।

अदालत के आदेश की अवमानना पर कानूनी कार्यवाही दर्ज की जा सकती है।


अदालत ने आदेश दिया कि मंदिर बोर्ड अधिनियम 1992 की धारा 28 में वर्णित प्रावधानों से परे किसी भी रूप में निधि का उपयोग न किया जाए। साथ ही मुख्य कार्यपालक अधिकारी और अध्यक्ष को निर्देशित किया गया कि वे निरस्त प्रस्ताव के तहत कोई भुगतान या स्वीकृति जारी न करें।

भक्तों के लिए जीत, पारदर्शिता की दिशा में कदम

यह फैसला भक्तों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है। वर्षों से उठ रही यह मांग अब अदालत के संरक्षण में आ गई है कि सांवलियाजी मंदिर की राशि वहीं खर्च हो जहाँ उसकी वास्तविक आवश्यकता है—मंदिर और भक्तों की सुविधाओं पर।

इस निर्णय ने साफ संदेश दिया है कि धार्मिक आस्था से जुड़े धन का उपयोग राजनीतिक लाभ या बाहरी योजनाओं के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा और धार्मिक भावना के मूल उद्देश्य के लिए होना चाहिए।

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