गवरी उत्सव शुरू: मेवाड़ में 40 दिनों तक जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संदेश

गवरी: जल, जंगल, और जमीन की रक्षा का पवित्र उत्सव शुरू
मेवाड़ में रविवार को ठंडी राखी के साथ गवरी उत्सव की शुरुआत हुई। यह 40 दिनों तक चलने वाला अनुष्ठान प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक है। शहर के पुलां और देबारी क्षेत्रों में गवरी की शुरुआत हुई, जहाँ सुबह पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ कलाकारों ने विशेष वस्त्र धारण किए।
पुलां में छह साल बाद गवरी का आयोजन हुआ है, जिसमें 300 से अधिक कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। खास बात यह है कि अगले सवा महीने तक ये कलाकार अपने घरों से दूर मंदिरों में रहेंगे। इस उत्सव की एक अनूठी विशेषता यह है कि महिला पात्रों का अभिनय भी पुरुष ही करते हैं

गवरी, भील समुदाय का एक पारंपरिक लोकनृत्य और नाट्य रूप है, जो सामाजिक जागरूकता का संदेश देता है। कलाकार गांव या शहर के चौकों में एक गोलाकार मंच बनाते हैं, जिसके केंद्र में माँ पार्वती (गौरज्या) को स्थापित किया जाता है। थाली और मांदल की थाप पर कलाकार गोल चक्कर में नृत्य करते हुए संवादों के जरिए कहानियाँ प्रस्तुत करते हैं।

इस नृत्य-नाटिका के माध्यम से समाज को कई संदेश दिए जाते हैं। जैसे, गोमा के खेल से चोरी से बचने, कालू कीर के खेल से जीव हत्या न करने, भीलू राणा के खेल से साहस के साथ संकटों का सामना करने, सेठजी के खेल से सदा प्रसन्न रहने, कान्हा-गुजरी के खेल से प्रेम की भावना, और राजा-रानी के खेल से नारी शक्ति और सम्मान का महत्व बताया जाता है।
यह उत्सव न केवल सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है, बल्कि जल, जंगल और जमीन के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश भी देता है।

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